महाराज बनाम कार्यकर्ता — मध्यप्रदेश बीजेपी में किसकी बढ़ रही ताकत ?
महाराज बनाम कार्यकर्ता” — सत्ता के गलियारों में नई पटकथा
लेखक _ किशोर कुशवाहा
मध्यप्रदेश की राजनीति भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। यहां मौसम और नेताओं की निष्ठा बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। सन् 2018 का वो दौर याद कीजिए, जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस की वापसी का शंखनाद हुआ था। मंचों पर मुस्कानें थीं, नारों में जोश था और जनता को लग रहा था कि अब “15 साल बनाम 15 महीने” की नई कहानी लिखी जाएगी। उस समय कांग्रेस के पोस्टरों में एक तरफ अनुभवी कमलनाथ थे तो दूसरी तरफ युवा चेहरे के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया। कार्यकर्ताओं को भरोसा था कि पार्टी अब दो इंजनों से दौड़ेगी।
लेकिन राजनीति में इंजन कम और ईंधन ज्यादा मायने रखता है। कुर्सी का ईंधन खत्म हुआ और सरकार की गाड़ी बीच रास्ते में ही बंद हो गई। सिंधिया समर्थकों की नाराजगी ऐसी बढ़ी कि देखते ही देखते 22 विधायक “हाथ” छोड़कर “कमल” की शरण में पहुंच गए। कांग्रेस की सरकार ऐसे गिरी जैसे किसी ने ताश के पत्तों की गड्डी पर जोर से फूंक मार दी हो। भाजपा खुश थी, कांग्रेस स्तब्ध थी और जनता टीवी चैनलों पर “ब्रेकिंग न्यूज़” देख-देखकर राजनीतिक विज्ञान की मुफ्त क्लास ले रही थी।
फिर आया 2023 का विधानसभा चुनाव। भाजपा ने सिंधिया समर्थकों को टिकट भी दिए। उम्मीद थी कि महाराज का जादू चलेगा, जनता आशीर्वाद देगी और समर्थक फिर से विधानसभा पहुंचेंगे। लेकिन जनता भी अब बड़ी चालाक हो चुकी है। उसने कई जगह ऐसा हिसाब किया कि कुछ नेताओं का राजनीतिक कैलकुलेटर ही हैंग हो गया। कई सिंधिया समर्थकों को हार का सामना करना पड़ा। जो कभी सत्ता के केंद्र माने जाते थे, वो धीरे-धीरे किनारों पर दिखाई देने लगे।
हालांकि राजनीति में “समाप्त” शब्द उतना ही झूठा है जितना चुनाव से पहले किया गया हर वादा। इसलिए सिंधिया खेमे के कुछ नेता अब भी सत्ता में हैं, मंत्री भी हैं और मुस्कुराते भी हैं। लेकिन वो पुरानी धमक… वो “महाराज आ रहे हैं” वाली गूंज अब थोड़ी धीमी जरूर पड़ गई है।
इधर मई 2026 में अचानक एक नया दृश्य सामने आता है। गुना से सांसद रहे कृष्णपाल यादव उर्फ केपी यादव को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिलती है। अब राजनीति में जिम्मेदारी मिलना और शक्ति मिलना, दोनों अलग बातें होती हैं। लेकिन जब जिम्मेदारी के स्वागत में 500 से ज्यादा गाड़ियों का काफिला भोपाल की ओर निकले, तब समझ जाइए कि संदेश सिर्फ स्वागत का नहीं, शक्ति प्रदर्शन का भी है।
भोपाल की सड़कों पर गाड़ियों का काफिला देखकर लोग यही सोच रहे थे कि यह कोई राजनीतिक यात्रा है या फिर किसी नई वेब सीरीज का ट्रेलर लॉन्च। हर गाड़ी जैसे कह रही थी — “संघर्ष की EMI आखिरकार पास हो गई।”
लेकिन असली मनोरंजन सड़क पर नहीं, सोशल मीडिया पर शुरू हुआ। एक तरफ सिंधिया समर्थक थे, दूसरी तरफ केपी यादव समर्थक। फेसबुक की पोस्टें तलवार बन गईं, ट्विटर के शब्द बाण बन गए और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में राजनीतिक पीएचडी शुरू हो गई। कोई लिख रहा था “जमीन का नेता कौन”, तो कोई बता रहा था “जनता का असली सिपाही कौन।”
राजनीति के जानकार मुस्कुराकर कह रहे हैं कि भाजपा में अब दो तरह की राजनीति साथ-साथ चल रही है — एक “राजघराने वाली राजनीति” और दूसरी “कार्यकर्ता से नेता बनने वाली राजनीति।” फर्क सिर्फ इतना है कि पहली राजनीति में पहचान विरासत से मिलती है, जबकि दूसरी में धूप में पोस्टर लगाने से।
सिंधिया को कांग्रेस में जो सम्मान मिला था, वो भाजपा में पूरी तरह नहीं मिल पाया — यह बात अब उनके समर्थक धीरे-धीरे खुलकर कहने लगे हैं। कांग्रेस में वो “भविष्य” थे, भाजपा में वो “जरूरत” बनकर आए। और राजनीति में जरूरतें समय के साथ बदलती रहती हैं।
वहीं केपी यादव की कहानी भाजपा के उस पुराने मॉडल जैसी लगती है जिसमें कार्यकर्ता सालों तक पसीना बहाता है, पोस्टर लगाता है, भीड़ जुटाता है और एक दिन अचानक पार्टी कहती है — “अब तुम्हारी भी सुन ली जाए।” यही कारण है कि उनके समर्थन में दिखा काफिला सिर्फ गाड़ियों का नहीं था, बल्कि उन कार्यकर्ताओं की उम्मीदों का भी था जो मानते हैं कि मेहनत का फल कभी न कभी मिलता जरूर है।
अब सवाल ये नहीं है कि कौन बड़ा नेता है। सवाल ये है कि भाजपा में भविष्य किस मॉडल का है — “महाराज मॉडल” या “कार्यकर्ता मॉडल”? क्योंकि राजनीति में सम्मान सिर्फ पद से नहीं मिलता, संगठन में पकड़ और कार्यकर्ताओं के दिल में जगह से भी मिलता है।
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